मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाष्वती समाः यत् क्रौंच मिथुनादेकमवधिः काम मोहितम् आदिकवि वाल्मीकि के मुख से अनायास निकला हुआ यह पहला श्लोक से उन्हें रामायण महाकाव्य लिखने की प्रेणना मिली।

एक दिन दोपहर के समय महर्षि वाल्मीकि तमसा नदी के किनारे प्रकृति की सुंदरता का आनंद ले रहे थे। बसंत उतर रहा था। पेड़ों की छाया सुखद लगने थी। वन पर्वत सब हरे भरे थे। तमसा मंद गति से बह रही थी। नदी का जल निर्मल था। उसमें तैरती हुई मछलियां चमक रही थीं और नदी ताल भी साफ़ दिखाई दे रहा था। हरे भरे वन में भांति भातिं के पक्षी कलरव कर रहे थे।

नदी के किनारे लंबी चोंचवाले चटकीले रंग के पक्षी एक पाँत में ध्यान लगाए बैठे थे। उनमें से कभी कोई तेजी से उड़ता और तीर की तरह पानी में चोंच डूबोकर कुछ पकड़कर ले जाता। नदी तट की शोभा को देखकर महर्षि वाल्मीकि के मन में अपार हर्ष था। सहसा उनके कान में क्रौंच पक्षी की सुरीली ध्वनि पड़ी। आँख उठाई तो देखा क्रौंच पक्षी का एक जोड़ा नदी तट पर कल्लोल कर रहा है। क्रौंच कभी चोंच से एक दूसरे के पीठ सहलाते। कभी थोड़ा सा उड़कर वे इधर उधर बैठ जाते और फिर पास आकर खेलने लगते। महर्षि वाल्मीकि को ये क्रौंच बड़े प्यारे लग रहे थे।

इतने में नर क्रौंच को निषाद का तीर कहीं से आकर लगा और वह गिरकर छटपटाने लगा। पति की यह दशा देखकर क्रौंच बड़े करुण स्वर में रोने लगी। क्रौंच मिथुन की यह दशा देखकर ऋषि का हृदय करुणा से भर गया। वे शोक सागर में डूब गए। उनके हृदय की करुणा एक श्लोक में फूट पड़ी। हे निषाद तू बहुत दिन तक प्रतिष्ठित न रह सकेगा क्योंकि तूने क्रौंच के जोड़े में से प्रेममग्न नर पक्षी को मार डाला है। बड़ी देर तक वाल्मीकि शोक के कारण बेसुध से रहे।

जब वे स्थिरचित्त हुए तब अपने प्रिय शिष्य भरद्वाज से बोले भरद्वाज मेरे शोक पीड़ित हृदय से वीणा के लय में गाने योग्य चार पदों और समान अक्षरों का यह वचन अनायास ही निकला है। मेरा मन कह रहा है कि अवश्य ही यह प्रसिद्ध होगा। भरद्वाज ने यह श्लोक कंठाग्र कर लिया और गुरु को सुनाया। इसे सुनकर वाल्मीकि बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने स्नान किया और वल्कल वस्त्र पहनकर शिष्य के साथ वे अपने आश्रम को चल दिए।

मार्ग में भी वाल्मीकि मा निषाद गुनगुनाते चले जाते थे। उनका ध्यान श्लोक के अर्थ पर गया। अर्थबोध से उनका बड़ा दुःख हुआ। वे सोचने लगे कि मैंने व्यर्थ ही निषाद को इतना कठोर शाप दे दिया। इसी चिंता में मग्न वे चले जा रहे थे की उनको नारद जी की वाणी याद पड़ी। एक बार नारद जी से उन्होंने पूछा था हे देवर्षि मुझे किसी ऐसे पुरुष का नाम बताइए जो गुणवान बलवान और धर्मात्मा हो जो सत्य पर दृढ रहता हो अपने वचन का पक्का हो सबका हित करने वाला हो विद्वान हो और जिससे बढ़कर सुंदर कोई दूसरा न हो।

नारद जी ने कहा था कि ऐसे एक ही पुरुष को मैं जानता हूँ। वे इक्ष्वाकु वंश के राजा दशरथ के पुत्र राम हैं। वे सब तरह से गुणवान और रूपवान हैं और जब क्रोध करते हैं तब डर के मारे देवता और दानव भी काँप उठते हैं। वाल्मीकि को ये सब बातें याद पड़ीं और रामायण की जो कथा नारद जी ने संक्षेप में सुनाई थी वह भी उनको याद आई यह याद आया कि देवर्षि देवलोक को आकाश मार्ग से किस अद्भुत गति से चले गए थे।

जब महाराज रामचंद्र की कथा वे दोहराने लगे तो सहसा माँ निषाद श्लोक का एक दूसरा अर्थ उनके मन में आया है माधव रामचंद्र तू अनेक वर्ष तक राज करेगा क्योंकि तूने मंदोदरी रावण जोड़े में से कामपीड़ित रावण को मार डाला है। यह अर्थ मन में आते ही उनकी चिंता मिट गई। परन्तु मा निषाद श्लोक उनके मन से नहीं निकला। वे उसे प्रायः गुनगुनाते रहे। एक दिन वाल्मीकि जब ध्यान में बैठे हुए मा निषाद गुनगुना रहे थे सृष्टि के रचयिता ब्रह्माजी ने उनको दर्शन दिए।

ब्रह्माजी बोले ऋषिवर मेरी ही इच्छा से यह वाणी अनायास आपके मुहं से निकली है और श्लोक के रूप में इसलिए निकली है कि आप अनुष्टुप छन्दा में महाराज रामचंद्र के सम्पूर्ण चरित्र का वर्णन कीजिये। श्रीराम की कथा संक्षेप में आप नारद जी ने सुन ही चुके हैं। मेरे आशीवार्द से राम लक्ष्मण सीता और राक्षसों का गुप्त अथवा प्रत्यक्ष सब वृत्तांत आपकी आँखों के सामने आ जाएगा जो आगे होगा वह भी दिखाई पड़ेगा।

अतः जो आप लिखेंगे वह यथार्थ और सत्य होगा। इस प्रकार आपकी लिखी हुई रामायण इस लोक में अम्र हो जाएगी। इतना कहकर ब्रह्माजी अंतर्धान हो गए। वाल्मीकि श्लोकों में श्रीराम के चरित्र का वर्णन करने लगे। सब श्लोक मधुर और सुंदर थे। उनका अर्थ समझने में भी कोई कठनाई नहीं होती थी। उनके सामने राम लक्ष्मण सीता दशरथ और दशरथ की रानियों का हंसना बोलना चलना फिरना प्रत्यक्ष हो गया और वे बिना रुके रामायण की कथा लिखते रहे। चौबीस हजार श्लोकों में उन्होंने पूरी रामायण लिख डाली।