अकबर बीरबल कहानी कबर के राज्य में एक कंजूस था जो एक झोंपड़ी में रहता था और अ उसने अपना सारा धन सोने के सिक्कों के रूप में जमा किया था। एक दिन उसकी झोंपड़ी में आग लग गयी और वह जलने लगी। कंजूस बाहर खड़ा होकर बहुत जोर जोर से रोने लगा।

लेकिन उसकी अन्दर जाने की हिम्मत नहीं हो रही थी। तभी वहां से एक व्यापारी गुजरा और उसने पूछा तुम अपनी इस टूटी फूटी झोंपड़ी के लिए क्यों रो रहे हो जिसकी कोई कीमत नहीं है। कंजूस “उसमें मेरी सारी जमा पूंजी है। व्यापारी वह लगभग कितनी होगी कंजूस “सौ सोने के सिक्के। व्यापारी अगर मैं अपना जीवन दांव पर लगाकर अंदर जाऊं तो तुम मुझे क्या दोगे कंजूस “एक सोने का सिक्का।

व्यापारी मैं अपना जीवन दांव पर लगा दूंगा और तुम मुझे केवल एक सिक्का दोगे ऐसा नहीं होगा। मैं ऐसा तभी करूंगा जब तुम मुझसे वादा करोगे कि तुम मेरी पसंद की ही चीज़ दोगे। कंजूस पहले तो आनाकानी करने लगा पर फिर मान गया। व्यापारी अंदर घुसा और जहां कंजूस ने बताया था वहां से वह खज़ाना निकाल कर ले आया। व्यापारी उस व्यक्ति से बोला तुमने कहा था मैं तुम्हें वही दूंगा जो मुझे पसंद होगा।

मैं सारे सिक्के रखूगा और तुम यह थैला रख लो। कंजूस वहां खड़ा होकर जोर जोर से चिल्लाने लगा। जब तक कुछ लोगों ने बीरबल तक यह बात पहुंचा दी। व्यापारी ने बीरबल को सारी बात समझाई। बीरबल ने कंजूस से पूछा कि जो व्यापारी कह रहा है वह सब ठीक है। कंजूस ने बात मान ली।

बीरबल व्यापारी तुमने कंजूस को वही देने को कहा जो तुम्हें पसंद था। तुम्हें तो सोने के सिक्के पसंद हैं न व्यापारी हां लेकिन बीरबल अगर तुम्हें सिक्के पसंद हैं तो तुम वो उस व्यक्ति को दो। व्यापारी को आखिर ऐसा करना पड़ा।

शिक्षा हमें अपने शब्दों का चयन समझदारी से करना चाहिए। वरना हम परेशानी में आ सकते हैं। भाषा हमारे विचारों के संप्रेषण का एकमात्र स्रोत है लेकिन अगर हम इस संप्रेषण में शब्दों का चयन सोच समझकर न करें तो पूरी बातचीत में केवल समय व कभी कभी धन की बर्बादी भी हो सकती है।